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Sunil Kumar AIR-22 Essay Hindi Class Notes 4 You

Sunil Kumar Dhanwanta AIR-22 UPSC CSE 2021 Essay Writing Format Class Notes 4 You 




उच्चतम शिक्षा वो नहीं जो हमें सिर्फ जानकारी देती है बल्कि वह है जो हमारे जीवन को सभी चराचर जगत के साथ समन्वित करती है ।                                -  रविन्द्रनाथ टैगोर The highest education is that which does not merely gives us information but makes your life in harmony with all existence.

“न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।

व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ।। ”

(अर्थात न चोर चुरा ले पाए, न राजा हरण कर पाए, इसका न भार हो, और न भाईयों में बँट पाए, खर्च करने पर सदा, ये बढता ही जाये ,ऐसे विद्या धन का मोल कोई कैसे कर पाए ।) 

भारतीय परंपरा में विद्या धन को सर्वश्रेष्ठ माना गया है और व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए इसको आधारभूत तत्त्व के रूप में स्वीकार किया जाता है । मनुष्य आदिकाल से अपना जीवनयापन कर रहा है लेकिन जिस एक चीज जिसने उसके जीवन को नया अर्थ दिया वह है- शिक्षा । विश्व भर में अलग-अलग प्रकार की शिक्षा व्यवस्था प्रचालन में हैं और उसी से वहाँ के निवासियों की दशा और दिशा तय हो रही है। शिक्षा दो प्रकार की हो सकती है- एक वह जो व्यक्ति को केवल आसपास के तथ्यों और सिद्धांतों की केवल जानकारी देती है और दूसरी वह जो व्यक्ति को ये जानकारी देने के साथ-साथ उस जानकारी का विश्लेषण करना बताती है ,उन पर सवाल करना सिखाती है, उनके प्रति संवेदनशीलता के साथ सोचने को प्रेरित करती है । जैसे उदाहरण के लिए हमें भारत के लोगों के बारे में जानना है तो एक अप्रोच तो यह हो सकती है कि हम जनसंख्या के आकड़ों को लेकर जान लें कि देश में कितने लोग हैं , कितने पुरुष और कितनी महिलायें हैं इत्यादि । लेकिन दूसरी अप्रोच यह होगी कि हम आँकड़ों के साथ-साथ लोगों की जीवन दशा, संस्कृति, व्यवहार, अमीरी-गरीबी इत्यादि का सम्पूर्ण अध्ययन करें और उसमें यथासंभव पशु-पक्षियों और पर्यावरण का अध्ययन भी शामिल किया जाए । टैगोर जी शिक्षा में दूसरे अप्रोच को बढ़ावा देने के पक्षधर थे जिसके अंतर्गत तथ्यात्मक ज्ञान के साथ नैतिक ज्ञान और व्यक्तित्व का विकास भी शामिल होता हो। 

महान समाज सुधारक और भक्ति आंदोलन के शिखर पुरुष संत कबीर भी कुछ ऐसी ही धारणा को बढ़ावा देते हुए दिखते है जहाँ वे कहते है कि व्यक्ति को किताबी/शास्त्रीय ज्ञान को नकारकर आपसी प्रेम और सौहार्द की भावना वाले ज्ञान का समर्थन करते हैं । वे कहते हैं-

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।”

असली शिक्षा वह होती है जो एक व्यक्ति को कृत्रिम और कठोर मानव से संवेदनशील, विनम्र और सबके प्रति सम्मान का भाव रहने वाला बनाती है । विनम्र व्यक्ति ही दूसरों का दुख समझकर उसमें भागी होता है और यही जीवन का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए । भारतीय शास्त्रों में कहा गया कि इसी प्रकार की शिक्षा ही मनुष्य को असली सुख प्रदान कर सकता है अर्थात- 

“विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् ।

पात्रत्वाध्दनमाप्नोति धनाध्दर्मं ततः सुखम् ।।”

उच्चतम शिक्षा वही होती है जो व्यक्ति जो व्यक्ति को संकीर्ण मानसिकता और रूढ़िवादिता से मुक्त करके विचारशील, आधुनिक और संवेदनशील बनाती है । तभी कहा जाता है –“ सा विद्या या मुक्तये”। अर्थात व्यक्ति को अपने स्वार्थ के अलावा दूसरों के हितों के बारे में सोचकर समाज की उन्नति के बारे में खुले विचार रखना चाहिए।  

एक शिक्षित व्यक्ति अपने ज्ञान पर घमंड नहीं करता अर्थात ‘थोथा कहना बाजे घणा’ का पालन न करते हुए , वह अपना ज्ञान सभी में बाँटकर सभी को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है । वह हमेशा कुछ सीखने को लालायित रहता है  जैसा कि महान दार्शनिक सुकरात ने कहा है –“मैं ज्ञानी उस अर्थ में हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता। ” इसके अलावा उन्होंने कहा है कि हमें लोगों को विचार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए तथा अपने आसपास के प्राणिमात्र के प्रति संवेदनशीलता से सोचने की शिक्षा देनी चाहिए। वे कहते हैं- “मैं किसी को कुछ भी नहीं पढ़ा सकता मैं केवल उन्हें सोचने पर मजबूर कर सकता हूँ।" अतः हमें इन सभी विचारों को ध्यान में रखते हुए ही शिक्षा व्यवस्था का विकास करना चाहिए। 

इसका अर्थ यह है कि नैतिक शिक्षा ही व्यक्ति की और समाज की असली उद्धारक है। नैतिक शिक्षा एक मनुष्य को पशुवत जन्मे मनुष्य से मानव बनाती है । वर्तमान में शिक्षा में नैतिकता के गिरते स्तर के कारण विश्व भर को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है । समाज द्वारा अंधाधुंध भौतिक विकास को बढ़ावा देने के कारण पर्यावरण की उपेक्षा हुई है जिसका परिणाम ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसे भयावह संकट हैं । पशु-पक्षियों के प्रति समाप्त संवेदनशीलता के कारण इनके अवैध शिकार और तस्करी में वृद्धि होने से हजारों प्रजातियाँ संकटापन्न अवस्था में पहुँच चुकी हैं। वैश्विक आतंकवाद के कारण प्रतिदिन सैकड़ों मासूम लोगों की हत्या हो रही है । नस्लीय, धार्मिक और अन्य उत्पीड़नों की वजह से लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और शरणार्थी संकट विश्व समुदाय के समक्ष एक चुनौती बन चुका है। ये सब संकट पैदा हुए है शिक्षा व्यवस्था के गिरते नैतिक मानकों के कारण । हालाँकि अभी भी जापान जैसे देश ऐसे हैं जो शिक्षा में मूल्यों के विकास पर अत्यंत जोर देते हैं। वहाँ व्यक्ति को एक नैतिक और संवेदनशील नागरिक बनाने पर ध्यान दिया जाता है। जापानी नागरिकों आज विश्व में सर्वाधिक अनुशासन वाला और सत्यनिष्ठ नागरिक माना जाता है । अतः सभी चुनौतियों के समाधान का रास्ता केवल अच्छी और नैतिक शिक्षा के माध्यम से ही निकाल सकता है ।  गांधीजी ने कहा है कि –“शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो व्यक्ति को अच्छे-बुरे का ज्ञान प्रदान कर उसे नैतिक बनने के लिये प्रेरित करे ।” गांधीजी का यह कथन टैगोर के कथन के साथ पूर्ण साम्यता रखता है। महात्मा बुद्ध ने भी व्यक्ति को सभी जीवों के प्रति दया करने और उनके प्रति संवेदनशील होकर जीवन जीने का उपदेश दिया। महान शासक सम्राट अशोक ने भी अपने नागरिकों को नैतिक शिक्षा देने के उद्देश्य से स्थापित अपने अभिलेखों में ‘धम्म का उपदेश’ देते हुए कहा है कि प्रत्येक नागरिक को नैतिक जीवन जीना चाहिए और चराचर जगत के प्रति दयाभाव रखना चाहिए और करूणा का भावना रखनी चाहिए । 

जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ में ही कहा है कि व्यक्ति अंधाधुंध शुष्क विकास के कारण अपने और संसार के तत्वों के बीच सामंजस्य के अभाव में पीड़ा का अनुभव करता है और यदि उसका ये सामंजस्य सफल हो जाए तो वह आनंद की प्राप्त का सकता है और ये हो सकता है अच्छी और नैतिक शिक्षा से । वे कहते हैं- 

“ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की,

एक दूसरे से न मिल सके,यह विडंबना है जीवन की”

एक विद्वान ने शिक्षा व्यवस्था में मूल्यों के विकास के संदर्भ में कहा है –“ मूल्यों से वंचित शिक्षा, जैसी अभी उपयोगी है, व्यक्ति को अधिक चतुर शैतान बनाने जैसी होती है। ” अर्थात सही अर्थों में हमारी शिक्षा व्यवस्था को नैतिक मनुष्यों के निर्माण पर ज्यादा बल देना चाहिए। ऐसे मनुष्य जो केवल स्वार्थी न होकर दूसरे जीवों के बारे में भी सोचे और ‘जीवेषु दयां कुरु’ के भाव को हमेशा अपने अंदर रखें । छायावाद के वरिष्ठतम कवि जयशंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य ‘कामायनी’ में ‘मानववाद’ के दर्शन का समावेशन करते हुए कहा है कि व्यक्ति को केवल अपने सुखों की चिंता नहीं करनी चाहिए बल्कि पशु-पक्षियों और कमजोर प्राणियों के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए । इसमें श्रद्धा मनु से कहती है –

“औरों को हंसते देखो मनु, हंसो और सुख पाओ,

अपने सुख को विस्तृत कर लो सबको सुखी बनाओ।”

टैगोर के इन्हीं विचारों को हाल ही में घोषित नई शिक्षा नीति,2020 में शामिल करने का प्रयास किया गया है । इस नीति में तथ्यात्मक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक शिक्षा प्रदान करने और व्यक्तित्व निर्माण करने पर बाल दिया गया है। हालाँकि अभी भी शिक्षा व्यवस्था में अनेक कमियाँ उपस्थित है जैसे नैतिक शिक्षा के लिए एक व्यवस्थित पाठ्यक्रम का न होना, नैतिक शिक्षा का अनिवार्य न होकर वैकल्पिक होना, समाज में नैतिक मूल्यों का होता त्वरित पतन, बढ़ते उपभोक्तावाद के कारण पर्यावरण शिक्षा की अनदेखी इत्यादि । अतः हमें उपरोक्त खामियों का त्वरित निराकरण कर शिक्षा को टैगोर जी के आदर्शों के अनुसार बनाना चाहिए जिसमें तथ्यात्मक जानकारी के साथ साथ नैतिक शिक्षा भी छात्रों  को प्रदान की जाए ।  भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. कलाम ने भी कहा है कि यदि भारत से भ्रष्टाचार मिटाकर देश का विकास करना है व्यक्तित्व निर्माण करने पर बाल दिया गया है। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. कलाम ने भी कहा है कि यदि भारत से भ्रष्टाचार मिटाकर देश का विकास करना है तो हमें शिक्षा व्यवस्था में सुधार करके नैतिक मानवों का निर्माण करना होगा।    

शिक्षा व्यवस्था और नीतिशास्त्र को समन्वित करने के लिए रणनीति बनाने की आवश्यकता है। हमें छात्रों को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान इत्यादि की तथ्यात्मक जानकारी देने के साथ-साथ नैतिक शिक्षा जिसमें संवेदनशीलता, सौहार्द, मानवतावाद, सत्यनिष्ठा इत्यादि मूल्य प्राथमिक होंगे, भी देना होगा । शुष्क भौतिक प्रगति तो हमने बहुत कर ली और उसी का परिणाम है कि विश्व समुदाय अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है अब हमें आवश्यकता है मानवीय प्रगति की जिसका आधार होगी एक सुदृढ़ नैतिक शिक्षा व्यवस्था । नैतिक शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य बनाना, स्पष्ट और सुव्यवस्थित पाठ्यक्रम बनाना, समाज में नैतिक व्यक्तियों को प्रोत्साहित कर लोगों को नैतिक मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करना, प्रत्येक कार्यक्षेत्र के लिए नैतिक मानकों को बनाना इत्यादि कदम हमें शीघ्र उठाने होंगे ।  

शिक्षा व्यवस्था ही भविष्य की दिशा तय करेगी और निर्धारित करेगी कि कौनसा समाज और देश असली प्रगति करेगा और उसके हमें सर्वांगीण विकास के लिए समावेशी और नैतिक शिक्षा को अपनाना होगा । ऐसी शिक्षा जो व्यक्ति के जीवन को नया आयाम दे, उसको संसार के सभी तत्वों के साथ जोड़ने का कार्य करे , उसको परोपकार के लिए प्रेरित करे,उसको संवेदनशील बनाए ; तभी जाकर शिक्षा का असली उद्देश्य पूरा होगा । इसके लिए समाज और सरकार को एक दूसरे के साथ गहन विचार-विमर्श करने के पश्चात रास्ता तय करना पड़ेगा कि किस और समाज को ले जाना है । दुनिया को नए विचारों में ढालने और नैतिक बनाने के लिए शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा तभी जाकर हम सही अर्थों में मानव बन पाएंगे । नेल्सन मंडेला ने इस अर्थ में कहा भी है – “शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिसे आप दुनिया बदलने के लिए प्रयोग कर सकते हैं।” इसी शिक्षा के परिणामस्वरूप व्यक्ति संसार के साथ एकत्व का अनुभव करेगा और अखंड आनंद का साक्षात्कार करेगा। जो निम्नलिखित पंक्तियों में स्पष्ट है –

"समरस थे जड़ या चेतन, सुंदर साकार बना था ,

चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था ।”

  

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